Panchtantra Moral Story on Friendship
दोनों मित्र पेड़ में पैसे रखते हुए |
दोनों में यह भी समझौता हुआ कि जब भी धन निकालना होगा साथ-साथ आकर निकाल लेंगे. धर्मचन्द भोला इमानदार नेक था जबकि नेतीराम बेईमान था.
वह दूसरे दिन चुपके से आकर धन निकालकर ले गया उसके बाद वह धर्मचन्द के पास आया और बोला- कि चलो कुछ धन निकाल लाये दोनों मित्र पेड के पास आये तो देखा कि धन गायब है. धर्मचन्द ने आव देखा न ताव फौरन नेतीराम पर इल्जाम लगा दिया कि धन तुमने ही चुराया है.
दोनों मे झगडा होने लगा बात राजा तक पहूंची राजा ने कहा- कल नींम की गवाही के बाद ही कोई फैसला लिया जायेगा. ईमानदार नेतीराम ने सोचा कि ठीक है नीम भला झूठ क्यों बोलेगा ? धर्मचन्द भी खुश हो गया दूसरे दिन राजा उन दोनों के साथ जंगल में गया उनके साथ ढेरों लोग थे सभी सच जानना चाहते थे.
राजा ने नीम से पूछा - हे नीमदेव बताओं धन किसने लिया है ? नेतीराम ने!! नीम की जड से आवाज आई.
यह सुनते ही नेतीराम रो पडा बोला - महाराज! पेड झुूठ नहीं बोल सकता इसमें अवश्य ही कुछ धोखा है. कैसा धोखा ? मैं अभी सिद्ध करता हूं महाराज. कहकर धर्मचन्द ने कुछ लकडीयां इकठी करके पेड के तने के पास रखी फिर उनमें आग लगा दी.
अरे बचाओ हाय जला. पेड की एक खो से आवाज आने लगी. राजा ने सिपाहीयों को आदेश दिया कि जो भी हो उसे बाहर निकालों सिपाहीयों ने फौरन खों में बैठे आदमी को बाहर खिच लिया.
उसे देखते ही सब चौंक पडे वह धर्मचन्द का पिता था. अब राजा सारा माजरा समझ गया. उसने पिता-पुत्र को जेल में डलवा दिया और उसके घर से धन जब्त करके नेतीराम को दे दिया. साथ ही उसकी ईमानदारी सिद्ध होने पर और भी बहुत सा धन दिया.
शिक्षा : ईमानदारी का फल सदैव मीठा ही होता है. और हमेशा विपरीत परिस्थितियों में शान्ति और सोच समझकर काम करना चाहिए. अगर नेतीराम अपनी समझ से पेड़ के तने में आग न लगाता तो वही असली चौर माना जाता. लेकिन नेतीराम ने अपनी समझ-बुझ से काम लिया और धर्मचंद का भंडा फोड़ दिया.
दूसरी बात यह की जिंदगी में हमेशा हर चीज का Backup लेकर चलो, आज का जीवन ऐसा है की यहां कभी भी कोई भी अपना, दोस्त या भाई कोई भी बेईमानी कर सकता है. या ऐसी स्थिति आ सकती है की आप बुराई में फंस जाए. इसलिए जरुरी है की हमेशा पूरी तैय्यारी से आगे की और कदम बढ़ाया जाए. बिना सोचे समझे कोई भी कार्य न करे और न ही कोई फैसला लें.
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